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बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

जिंदगी...कुछ इस तरह


गीत  : नागेश पांडेय 'संजय'

गुम गए मृदु स्वप्न भागम भाग में,
अब कहाँ झंकार जीवन-राग में.
बहुत पाकर भी, बहुत रीता रहा;
...
जिंदगी कुछ इस तरह जीता रहा.

थीं बहुत कर्कश उनींदी लोरियाँ,
थीं बहुत संदिग्ध स्नेहिल डोरियाँ.
कलेजा फटता रहा, सीता रहा.

जिंदगी ....

पीर से अनुबंध भारी पड़ गया,
त्रासदी के नाम पर तन चढ़ गया;
मन महाभारत, हृदय गीता रहा

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

साथी! वह भी दिन आएगा

गीत : डा. नागेश पांडेय ' संजय ' 

साथी! वह भी दिन आएगा।

शब्द रूठ जाएँगे स्वर से,
भावों का पनघट रोएगा।
सपनों की बोझिल गठरी को,
थका-थका यह मन ढोएगा।

आशाओं के महावृक्ष का
पत्ता-पत्ता झड़ जाएगा।

सिर्फ जागरण बन जाएगी-
सूने नयनों की परिभाषा।
तुम्हें देखकर गिरे, करेगा
अंतिम आँसू यह अभिलाषा।

मन चहकेगा चैखट पर जब,
कोई कागा चिल्लाएगा।

सुधि के गहन धुँधलके में बस,
तेरी ही छवि रह जाएगी।
बिना नेह प्राणों की बाती,
कब तक तन को दमकाएगी।

आखिर मौन नेह का पंछी,
पंख पसारे उड़ जाएगा।

मेरी चरण-धूलि कल शायद
शुष्क हवाओं को महकाए।
मेरा समाहार कल शायद,
जग का प्राक्कथन बन जाए।

मेरा नाम भले गुम जाए,
सृजन स्वयं को दोहराएगा।

साथी! वह भी दिन आएगा।

गुरुवार, 1 मार्च 2012

बिना तुम्हारे


गीत : नागेश पांडेय 'संजय'

बिना तुम्हारे साथी हर अभियान अधूरा है.
आज शोभते राजमार्ग, थीं जहाँ कभी पथरीली राहें,
             किन्तु चहकती चौपाटी पर जागा हुआ प्रेम रोता है.
 आज नयन में सिर्फ बेबसी और ह्रदय में ठंडी आहें,
एक मुसाफिर थका-थका-सा , यादों की गठरी ढोता है.
      पागल, प्रेमी और अनमना : अब जग चाहे जो भी कह ले,
बिना तुम्हारे साथी हर उपमान अधूरा है. 
बिना तुम्हारे साथी हर अभियान अधूरा है.
कहने को तो विजय चूमती पग-पग पर अब चरण हमारे,
सुयश धरा से नीलगगन तक कीर्ति-कथा को दुहराता है.
बनने को खुद ही उत्सुक अब सुखद लक्ष्य आभरण हमारे,
वैभव मुझे  पूज्य कह खुद ही मेरी और बढ़ा आता है. 
पर मुझको मेरा यह स्वागत, एक छलावा-सा लगता है,
बिना तुम्हारे साथी हर सम्मान अधूरा है. 
बिना तुम्हारे साथी हर अभियान अधूरा है.

शनिवार, 28 जनवरी 2012

गीत : तुम्हारा साथ न भूलूँगा - नागेश पांडेय संजय

गीत : नागेश पांडेय संजय 
चित्र : डा. रामेश्वर वर्मा 
तुम्हारा साथ न भूलूँगा।
मौन ने गढ़ी नयी भाषा,
नेह ने रचा नया इतिहास।
भाव के टूट गए सब बंध,
उदधि-सा उमड़ पड़ा विश्वास।

नयन ने कही, हृदय ने सुनी,
मधुर वह बात न भूलूँगा।

हारने की थी हममें होड़,
लुटाने की थी ललक अपार।
त्याग के शतदल खिले सहर्ष,
बिन छुए हुए एक-आकार।

जीत से अधिक प्रीतिकर लगी,
कि ऐसी मात, न भूलूँगा।

समर्पण भ्रमित, चकित अभिसार,
सु-रति के महल हो गए होम।
प्रेम का देख नया यह रूप,
समय के पंख हो गए मोम।
वासना श्लथ थी, संयम दीप्त,
अजब वह रात, न भूलूँगा।

सोमवार, 2 जनवरी 2012

उस शपथ से मुक्त कर दो-गीत : नागेश पांडेय 'संजय'

गीत : नागेश पांडेय 'संजय'
चित्र : रामेश्वर वर्मा 
उस शपथ से मुक्त कर दो,
वह शपथ साथी! मुझे रोने नहीं देती।
सुसंचित जलराशि को खुद में समेटे,
सिंधु ने कब किसी सरिता को पुकारा ?
कामना ले बूँद की वह रो रहा हो,
दृश्य ऐसा फिर मिले शायद दुबारा।
बूँद तो है बूँद उसका प्रस्फुटन क्या,
और साथी! शमन भी क्या!
सिंधु को ही शुष्क कर दो,
विशदता उसकी उसे खोने नहीं देती।
अनगिनत दैदीप्य तारक और विधु भी
अंक में जिसके बनाए हों बसेरा।
वही नभ जब दीपिका से ज्योति माँगे,
कहे-‘यह होगा बड़ा उपकार तेरा।’
सराहें उस दीपिका का भाग्य, या फिर
भाव नभ का पूज्य मानें ?
इन्हें अब संयुक्त कर दो,
क्यों नियति इनका मिलन होने नहीं देती ?
प्राप्य को खोकर कहो किसके लिए अब
वरूँ मैं अमरत्व, जीवन को सवारूँ  ?
हँसूं तो कैसे हँसूं मैं बिन तुम्हारे,
नहीं वश अपना अकेले जग निहारूँ ।
प्राण का संबंध तो अभिशाप बनकर
छल रहा है, इसलिए अब
शयन से नाता अमर दो,
जिंदगी तो अब मुझे सोने नहीं देती।

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

इतना अधिकार मुझे दो

गीत : नागेश पांडेय 'संजय' 
स्मृतियों में  सदा रहोगे,
बस, इतना अधिकार मुझे दो,
बाकी जिस पथ पर तुम चाहो
जा सकते हो, जाओ साथी!

मैं हूँ कौन, तुम्हें जो रोकूँ ?
मैं हूँ कौन, तुम्हे जो टोकूँ ?
मैं यथार्थ को समझ रहा हूँ,
इसीलिए बस, हार मुझे दो,
और कहर भी यदि तुम चाहो
ढा सकते हो, ढाओ साथी!

पाकर खोना भी पड़ता है,
जीवन ढोना भी पड़ता है,
मैं इसका पर्याय रहा हूँ,
इसीलिए मत प्यार मुझे दो
लेकिन सपनों में तो मेरे
आ सकते हो, आओ साथी।

मत तुम मेरा साथ निभाओ,
तुम तो मेरा पथ बन जाओ,
मैं चलने में कुशल बहुत हूँ ,
नहीं तृप्ति की धार मुझे दो,
अधरों पर यदि और प्यास तुम
ला सकते हो, लाओ साथी!

रविवार, 18 दिसंबर 2011

उर में कितने भाव सँजोए(गीत) : नागेश पांडेय 'संजय'


गीत : नागेश पांडेय 'संजय' 
चित्र : रामेश्वर  वर्मा 
उर में कितने भाव सँजोए
पर कहने की कला न आई ।
अत: उचित है मन की भाषा
पढ़ने का अभ्यास कीजिए !

इच्छाओं का सागर मन में 
सदा हिलोरे भरता आया,
किंतु बाँध ने सदा छला है, 
कहाँ प्रयत्न सफल हो पाया ?
भाव अव्यक्त रहे, अधरों पर 
रही सदा खामोशी छाई,
अत: उचित है जो कहता हूँ
बस, उस पर विश्वास कीजिए!

जीवन का उत्कर्ष सर्वदा 
लड़ता आया संघषों से,
हार न की स्वीकार उपक्रम 
यही चल रहा है वर्षों से।
नयन अश्रुपूरित हो आए 
जब हँसने की बारी आई ,
अत: उचित है मुझे विश्रंखल 
 देख न यूँ परिहास कीजिए!

एक तुम्हीं हो जिसमें मैंने 
आशाओं का दर्पण देखा,
बाकी सब लिप्सा प्रेरित थे 
तुममें मात्र समर्पण देखा
मेरे विश्वासों का शैशव 
पाए संवर्धित तरुणाई ,
अत: उचित है इस शैशव का
प्रिये ! समग्र विकास कीजिए!

नाम तुम्हारे लिख दी मैंने 
इस जीवन की खुशियाँ सारी,
तुम आओ तो जीवन महके,
तुम खुशियों की केसर-क्यारी।
मन के वृंदावन में सुख की 
मधुरिम मुरली पड़े सुनाई ,
अत: उचित है रास कीजिए,
ऐसे नहीं निराश कीजिए।
यह गीत उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान  की मासिक पत्रिका 'अतएव'  के सितम्बर, 1997 अंक में अमर गीतकार भारत भूषण के साथ प्रकाशित हुआ था.