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बुधवार, 10 अगस्त 2011

क्या पता था

गीत : नागेश पांडेय 'संजय' 
चित्रांकन : डा. रामेश्वर वर्मा 
क्या पता था 
नेह रुत
ऐसे ढलेगी ?

राम जाने 
चल पड़े
कब हम 
प्रणय की राह पर,
रोक भी 
खुद को
कहाँ पाए
निरंतर चाहकर!

क्या पता था 
चाहतें 
हमको छलेंगी ?

क्या पता था, 
भावना के
सिंधु में 
गोते बहुत हैं ?
क्या पता था? 
बाद हँसने के
नयन 
रोते बहुत हैं

क्या पता था 
प्रीति ये 
इतना खलेगी ?

मिल रहे 
मन से निरंतर,
मत कहो 
मजबूर हैं,
एक पल 
के लिए भी क्या
हो सके 
हम दूर हैं ?

प्रेम की 
यह ज्योति 
जीवन भर जलेगी।

1 टिप्पणी:

भावों की माला गूँथ सकें,
वह कला कहाँ !
वह ज्ञान कहाँ !
व्यक्तित्व आपका है विराट्,
कर सकते हम
सम्मान कहाँ।
उर के उदगारों का पराग,
जैसा है-जो है
अर्पित है।