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मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011

कितना और सफर ? :डा. नागेश पांडेय ' संजय '


गीत : डा. नागेश पांडेय ' संजय '
कितना और सफर है साथी!

यद्यपि चलना तो जारी है,
लेकिन कदम-कदम भारी है।
पूछ रही अलसाई आँखें-
‘कहाँ तुम्हारा घर है साथी ?’

संगदिल खड़ा सामने फिर भी,
मंजिल का कुछ पता नहीं है।
तेरी भी कुछ खता नहीं है,
मेरी भी कुछ खता नहीं है
शायद कई जनम बीतेंगे,
ऐसी मिली डगर है साथी!

यही आज तक सुनता आया,
सबकी सीमाएँ होती हैं।
पीर चीर देती है पत्थर,
मोहक प्रतिमाएँ रोती हैं।
जितना दर्द उधर है साथी!
उतना दर्द इधर है साथी!
कितना भी समझाओ लेकिन
मन तो आखिर मन होता है।
आँखें तो भर ही आती हैं,
जब सूना आँगन होता है।
तुम बिन कहाँ गुजर है साथी!
तुम बिन कहाँ बसर है साथी!

सच्चे मन से चाह रहा हूँ
क्या मेरा अपराध यही है ?
तेरा अर्चन मेरा जीवन
साथी! मेरी साध यही है।
नहीं घटेगा, नहीं मिटेगा
मेरा नेह अमर है साथी!

2 टिप्‍पणियां:

  1. साथी के लिए लिखी गई स्नेह भरी पाती .....अगर कोई प्यार करने वाला दिल समझे तो ...आपके शब्दों में बहुत गहराई हैं ...आभार

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भावों की माला गूँथ सकें,
वह कला कहाँ !
वह ज्ञान कहाँ !
व्यक्तित्व आपका है विराट्,
कर सकते हम
सम्मान कहाँ।
उर के उदगारों का पराग,
जैसा है-जो है
अर्पित है।