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रविवार, 3 जुलाई 2011

यह अकारण ही नहीं


गीत : डा. नागेश पांडेय  ' संजय '
मैं रहा बैठा बिछाए दृग-बिछौना,
आस का आकाश होता रहा बौना।
अब नयन हैं सजल, लेकिन
यह अकारण ही नहीं है ,
देर तक साथी! तुम्हारा पथ निहारा।

यह हृदय तूफान-सा ढोता रहा,
भाव का सागर बहुत रोता रहा।
अब अधर हैं विकल, लेकिन
यह अकारण ही नहीं है ,
कह नहीं पाए हृदय का भेद सारा।

अनगिनत पर्वत खड़े होते रहे,
न जाने क्यों पथ बड़े होते रहे ?
अब चरण हैं अचल, लेकिन
यह अकारण ही नहीं हैं,
बहुत चलकर भी न पाया दर तुम्हारा।

4 टिप्‍पणियां:

  1. मैं रहा बैठा बिछाए दृग-बिछौना,
    आस का आकाश होता रहा बौना।
    अब नयन हैं सजल, लेकिन
    यह अकारण ही नहीं है ,
    देर तक साथी! तुम्हारा पथ निहारा।
    aapki is kavita ne man mugdh kar diya.bahut pasand aai.pahli baar aapke blog par aai hoon aana vyarth nahi hua.aapke blog ko follow kar rahi hoon.saath hi apne blog par aane ka nimantran bhi de rahi hoon.

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भावों की माला गूँथ सकें,
वह कला कहाँ !
वह ज्ञान कहाँ !
व्यक्तित्व आपका है विराट्,
कर सकते हम
सम्मान कहाँ।
उर के उदगारों का पराग,
जैसा है-जो है
अर्पित है।