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शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

हो रही है जग-हँसाई (गीत)-नागेश पांडेय 'संजय'

गीत : नागेश पांडेय 'संजय'
तैल चित्र : रामेश्वर वर्मा 
तम भरी इस जिंदगी में
नेह बाती क्यों जलाई ?
रोशनी तो हो न पाई,
हो रही है जग-हँसाई।

फेंक शूलों की चटाई,
सेज फूलों की सजाई,
नींद तो फिर भी न आई
हो रही है जग-हँसाई।

अधलिखी वह प्रेम-पाती
आपने जब से पढ़ाई,
इधर सागर-उधर खाई,
हो रही है जग-हँसाई।

आपका अपराध क्या है?
वक्त की है बेवफाई,
नियति की भी है ढिठाई,
हो रही है जग-हँसाई।

मुक्त होकर जाल से
प्यासी मछरिया छटपटाई,
आह! यह कैसी विदाई।
हो रही है जग-हँसाई।

फूँकने को चैन, दिल में
आग हमने ही लगाई,
राख तक ना हाथ आई,
हो रही है जग-हँसाई।

कामनाओं की दुल्हनियाँ
अब्याही होकर लजाई,
भाँवरों के बिन सगाई,
हो रही है जग-हँसाई।

1 टिप्पणी:

भावों की माला गूँथ सकें,
वह कला कहाँ !
वह ज्ञान कहाँ !
व्यक्तित्व आपका है विराट्,
कर सकते हम
सम्मान कहाँ।
उर के उदगारों का पराग,
जैसा है-जो है
अर्पित है।