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गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

आत्मकथा : डा. नागेश पांडेय 'संजय '

गीत : डा. नागेश पांडेय 'संजय '

बैठो साथी! तुम्हें सुनाऊँ अपनी आत्मकथा।

जन्मा तो दुख ने हर्षित  हो 
मुझको गोद लिया,
चिहुँक-चिहुँक कर घुट्टी में ही 
मैंने दर्द  पिया।
विपदाओं ने पाला मुझको,
पीड़ाओं ने पोसा।
अगर सफल हो हँसा कभी, तो-
बाधाओं ने कोसा।
संघर्षों  के सागर से हों  भले रत्न निकले,
पर साथी! मैंने क्या पाया, मैं तो गया मथा।

बैठो, बैठो, तुम्हें सुनाऊँ अपनी आत्मकथा!

एकाकीपन, मौन हमारे
बचपन के थे मीत।
खेल-खेल में जिनके सँग में
गाए कितने गीत।
कष्टों की डालियाँ पकड़कर,
उनके सँग झूला,
अपने गहरे याराने को,
कभी नहीं भूला।
नजदीकी की बात करूँ क्या बालसखाओं से,
मेरा घर उनका घर, उनका घर मेरा घर था।

हाँ , हाँ आगे सुनो, सुनाऊँ अपनी आत्मकथा!

युवा हुआ तो अवसादों से
फेरे सात लिए,
दांपत्त्य अपना अनुपम है,
हँसकर सदा जिए।
बात अलग है यूँ  हम दोनों
मन से नहीं जुड़े।
बाहर-बाहर रहे चहकते,
भीतर सदा कुढ़े।
जीवन-साथी मेरे भावों को कब समझ सका, 
हँसने की कोशिश में साथी! उपजी सिर्फ  व्यथा।

हाँ, हाँ बैठो, और सुनाऊँ अपनी आत्मकथा!

अपनी जीवन-पुस्तक को मैं,
पढ़ता नहीं कभी,
कटु अतीत को, स्मृतियों में
मढ़ता नहीं कभी।
मुझे हिमालय-सा दृढ  कहकर
लोग बहकते हैं,
क्या जाने वे भीतर
ज्वालामुखी दहकते हैं।
छलक पड़ें ना मेरे आँसू तेरी आँखों से,
यहीं सोचकर यहीं रोकता अपनी व्यथा-कथा। 

अब मत कहना - मुझे सुनाओ अपनी आत्मकथा!

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई नागेश भाई आपकी ये कविता पढ़कर मन व्यथित हो गया ...

    बाहर-बाहर रहे चहकते,
    भीतर सदा कुढ़े।
    जीवन-साथी मेरे भावों को कब समझ सका,
    हँसने की कोशिश में साथी! उपजी सिर्फ व्यथा

    बहुत भावुक पन्तियाँ ........
    आपका पूरा परिचय पढ़ा आपसे बहुत कुछ सिखने को मिलेगा ..

    उत्तर देंहटाएं

भावों की माला गूँथ सकें,
वह कला कहाँ !
वह ज्ञान कहाँ !
व्यक्तित्व आपका है विराट्,
कर सकते हम
सम्मान कहाँ।
उर के उदगारों का पराग,
जैसा है-जो है
अर्पित है।