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बुधवार, 29 दिसंबर 2010

कौन आया ?

द्वार पर आहट हुई है,
देख तो लो, कौन आया ?

तड़पते मन की कसक की
गंध शायद पा गया वह,
उसे आना ही नहीं था
मगर शायद आ गया वह।
मुझे घबराहट हुई है,
देख तो लो, कौन आया ?

ज्योति यह कैसी ? बुझाने पर
अधिक ही जगमगाई।
यह फसल कैसी ? कि जितनी
कटी, उतनी लहलहाई।
प्रीति अक्षयवट हुई है,
देख तो लो, कौन आया ?

थम गईं शीतल हवाएँ,
दग्ध उर बेहाल हैं जी।
प्यास अब भी तीव्रतम है,
पर नदी पर जाल है जी।
आस सूना तट हुई है,
देख तो लो, कौन आया ?

क्यों जगत की वेदनाएँ
पल रहीं मन के निलय में ?
मधुर सपनों की चिताएँ
जल रहीं जर्जर हृदय में।
जिंदगी मरघट हुई है,
देख तो लो, कौन आया ?

जिंदगी की देहरी पर,
मौत को रोके खड़ा हूँ।
नयन तुझको देख भर लें,
बस इसी जिद पर अड़ा हूँ।
एक ही अब रट हुई है,
देख तो लो, कौन आया ?

6 टिप्‍पणियां:

  1. नागेश भाई
    आपका पूरा परिचय पढ़ा आपसे बहुत कुछ सिखने को मिलेगा ..

    manjula

    जवाब देंहटाएं
  2. word verification bhi hata dijiye tipaani bhejne may aasani hogi......

    जवाब देंहटाएं
  3. क्यों जगत की वेदनाएँ
    पल रहीं मन के निलय में ?
    मधुर सपनों की चिताएँ
    जल रहीं जर्जर हृदय में।

    बहुत भावपूर्ण...शब्दों और भावों का सुन्दर संयोजन और प्रवाह..बहुत सुन्दर

    जवाब देंहटाएं

भावों की माला गूँथ सकें,
वह कला कहाँ !
वह ज्ञान कहाँ !
व्यक्तित्व आपका है विराट्,
कर सकते हम
सम्मान कहाँ।
उर के उदगारों का पराग,
जैसा है-जो है
अर्पित है।