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बुधवार, 9 मार्च 2011

जिंदगी ठहरी हुई


जिंदगी ठहरी हुई

गीत : नागेश पांडेय संजय 
चल रही है श्वांस , लेकिन जिंदगी ठहरी हुई है . 

अधूरे-आधे मिलन की 
साक्षी हैं वीथिकाएँ .
स्वयं  के ही व्याकरण पर 
बहुत रोती हैं प्रथाएं.
नेह पर अनुबंधनों की पताका फहरी हुई है . 

छा गईं उन्मुक्त नभ पर , 
गर्विता  काली घटाएँ .
चीत्कारों के नगर में 
खो गईं अंतर व्यथाएं .
वेदना गूंगी  हुई ,संवेदना  बहरी  हुई है .

नियति के निष्ठुर लुटेरे , 
क्या पता , कब लूट  जाएँ .
क्षीण स्वर हृत-तंत्रिका  के 
भँवर  में कब छूट जाएँ . 
अन्तत: है डूबना , जीवन-नदी गहरी हुई  है . 



6 टिप्‍पणियां:

  1. वेदना गूंगी हुई ,संवेदना बहरी हुई है .

    हृदयस्पर्शी .... सुंदर रचना ...

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  2. जिंदगी के सफर की खुबसुरत प्रस्तुति....अभाव और लगाव का विशेष समन्वय।

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  3. अधूरे-आधे मिलन की
    साक्षी हैं वीथिकाएँ .
    स्वयं के ही व्याकरण पर
    बहुत रोती हैं प्रथाएं.... bahut badhiyaa

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भावों की माला गूँथ सकें,
वह कला कहाँ !
वह ज्ञान कहाँ !
व्यक्तित्व आपका है विराट्,
कर सकते हम
सम्मान कहाँ।
उर के उदगारों का पराग,
जैसा है-जो है
अर्पित है।