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सोमवार, 4 जुलाई 2011

पूर्णागिनी है वह / गीत : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'


राम ! ओ मेरे 
उसे 
उत्कर्ष देना तुम .

जानता हूँ 
उसे तुमने ही
बनाया है ,

पर  उसे 
तुमसे हमेशा 
श्रेष्ठ  पाया  है . 

मुझे इस
अनुराग की 
जो भी सजा  देना , 

किन्तु उसको 
मत कभी 
संघर्ष देना तुम . 

न धन , 
जीवन की मगर - 
मन संगिनी है वह . 

द्रष्टि में मेरी
सदा
पूर्णागिनी है वह .

मुझे तो 
जग के भले सब 
कष्ट दे देना .

किन्तु जब
देना उसे
बस हर्ष देना तुम . 

सहज है,
भावुक बहुत है
आत्मीया  है .  
सौख्यदा , 
सौभाग्यदा है , 
वन्दनीया  है . 

चाहता हूँ 
सदा उसका 
मानवर्धन हो ,

मुझ अकिंचन 
को भले 
अपकर्ष देना तुम . 

2 टिप्‍पणियां:

भावों की माला गूँथ सकें,
वह कला कहाँ !
वह ज्ञान कहाँ !
व्यक्तित्व आपका है विराट्,
कर सकते हम
सम्मान कहाँ।
उर के उदगारों का पराग,
जैसा है-जो है
अर्पित है।