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बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

जिंदगी...कुछ इस तरह


गीत  : नागेश पांडेय 'संजय'

गुम गए मृदु स्वप्न भागम भाग में,
अब कहाँ झंकार जीवन-राग में.
बहुत पाकर भी, बहुत रीता रहा;
...
जिंदगी कुछ इस तरह जीता रहा.

थीं बहुत कर्कश उनींदी लोरियाँ,
थीं बहुत संदिग्ध स्नेहिल डोरियाँ.
कलेजा फटता रहा, सीता रहा.

जिंदगी ....

पीर से अनुबंध भारी पड़ गया,
त्रासदी के नाम पर तन चढ़ गया;
मन महाभारत, हृदय गीता रहा

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपके गीतों का जवाब नहीं। हृदय से निकलते हैं और हृदय तक पहुँचते हैं।

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  2. बहुत खूबसूरत गीत लिखा है आपने ...दाद स्वीकारें :)

    उत्तर देंहटाएं

भावों की माला गूँथ सकें,
वह कला कहाँ !
वह ज्ञान कहाँ !
व्यक्तित्व आपका है विराट्,
कर सकते हम
सम्मान कहाँ।
उर के उदगारों का पराग,
जैसा है-जो है
अर्पित है।